प्रकृति के प्रति संवेदना है मनोविज्ञान

प्रकृति के प्रति संवेदना है मनोविज्ञान

यावद् भूमंडलम् धत्ते वन काननम्।

यावद् तिष्ठति मोदिन्याम् संतति: पुत्र पौत्रिकी॥

श्री दुर्गा सप्तशती के इस मंत्र का आशय यह है कि जब तक हम हरे वन, वृक्ष, वनस्पतियों तथा पर्वतों की संपदा का विनाश नहीं करते हैं, तब तक हमारी धरती माता हमारी ही नहीं, बल्कि हमारी भावी संतति का भी संवर्धन करती रहेंगी।
भारतीय संस्कृति का विकास सघन वनों में ही हुआ। हमारी संस्कृति के सजीव केंद्र तपस्थल और आश्रम वनों में ही स्थित थे। इसीलिए हमारी संस्कृति में वृक्षों को प्रेम, सहानुभूति और आदर प्राप्त है। हम पेड-पौधों को चेतन मानते हैं, उनके सुख-दुख में विश्वास करते हैं। वृक्ष को काटना यहां पाप तक माना गया है। सर जगदीश चंद्र बसु ने तो वैज्ञानिक रूप से सिद्ध कर दिया कि मनुष्य की तरह सुख, दुख, मृत्यु, शोक तथा हर्ष इत्यादि का प्रभाव पौधों पर भी पडता है। इस नजरिये से देखें तो वृक्ष पूजन का विज्ञान सूक्ष्म अनुसंधान का सूचक है। वैसे तो सभी वृक्ष लाभकारी हैं, परंतु बड, नीम, पीपल, तुलसी तथा आंवला के वृक्ष रासायनिक दृष्टि से बडे ही उपयोगी हैं। इसीलिए इनकी पूजा को धर्म में शामिल कर लिया गया। तुलसी का वृक्ष घर में लगाना, नित्य प्रात:काल उसका पूजन और उसमें जल देना हिंदू स्त्रियों की दिनचर्या के अनिवार्य हिस्से जैसा है। वैज्ञानिक स्वीकार करते हैं कि तुलसी के संसर्ग से वायु शुद्ध रहती है। इससे विषैले कृमियों का नाश होता है। वर में तो तुलसी अमृत तुल्य है। राजयक्ष्मा (टी.बी.) के रोगी को भी तुलसी से लाभ मिलता है। इसके सेवन से शरीर में संचित मल दूर हो जाते हैं। दूषित जल के शोधन के लिए तुलसी-पत्र डाले जाते हैं।

इसी प्रकार मंदिरों में पीपल लगाने और पूजने का विधान है। पीपल के फलों में अनेक तत्व होते हैं। इनका चूर्ण पौष्टिक होता है। पलाश, आंवला और बड भी बडे उपयोगी वृक्ष हैं। इनमें जीवनी शक्ति बढाने वाले कई तत्व हैं। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि हे धनंजय! संपूर्ण वृक्षों में मैं पीपल का वृक्ष हूं।

हमारे धर्म और संस्कृति में जो स्थान विद्या-व्रत, ब्रह्मचर्य, गऊ, देव, मंदिर, गंगा, गायत्री एवं गीता-रामायण आदि धार्मिक ग्रंथों का है, वैसे ही वृक्षों को भी महत्व दिया गया है। यह महत्व उनसे मिलने वाले लाभों को देखते हुए ही दिया गया है।
संसार में जितनी वनस्पतियां हैं, सभी औषधि रूप हैं। ऐसा आयुर्वेद में वर्णित है। इस तरह से छोटे-बडे सभी पेड-पौधे मनुष्यों के लिए लाभदायी हैं। बेल, आंवला, नीम, तुलसी, पीपल आदि के फल औषधियों में भी प्रयुक्त होते हैं। कई वृक्षों की डालियां और छालें भी दवाओं के काम आती हैं। पीपल आदि की समिधाओं से यज्ञ करके कई असाध्य रोग दूर करने का विधान भी ग्रंथों में मिलता है।

कहते हैं, भगवान शिव ने मानवता के रक्षार्थ विष पी लिया था। ये सब पेड-पौधे भी हमारे द्वारा छोडा गया कार्बन डाई आक्साइड पीकर हमें जीवनदायी ऑक्सीजन देते हैं। ऋषियों के आदेशों के मूल में निहित सूक्ष्म भावों को भले ही न जान सके हों, पर उनके आदेशों का पालन करके हम लाभान्वित हो रहे हैं। विश्व की सभी संस्कृतियां अपने-अपने ढंग से प्रकृति के साथ हमारे संबंधों को निर्देशित करने के लिए नैतिक मूल्य और आदर्श प्रदान करती हैं। हमें सभी पेड-पौधों के संरक्षण व संवर्धन के लिए एक आचार संहिता की जरूरत होगी। यह मानवीय आत्मा को सृष्टि के संवर्धन और दैवी उद्देश्यों की पहचान के लिए नई सार्वलौकिक चेतना प्रदान करेगी तथा इसी से भौतिक तथ्यों और आध्यात्मिक आदर्शो को समन्वित किया जा सकेगा।

पीपल, वट, तुलसी, शमी आदि की पूजा के पीछे ध्येय यह है कि मनुष्य इनकी उपयोगिता को समझे। आर्थिक दृष्टि से भी वन-संपदा को सहेजे रखने का बहुत महत्व है। मनुष्य को प्राणवायु तो वृक्षों से ही मिलती है। इसके मूल्य का आकलन कभी किया ही नहीं जा सकता। वर्षा कराने में वनों तथा पेड-पौधों की महत्वपूर्ण भूमिका है। जब अधिक वर्षा होती है तो भूमि का तल कट-कटकर सागर के पेट में पहुंचने लगता है। धरती की उर्वरा शक्ति ख्ात्म होने लगती है। धरती बंजर होने लगती है। ऐसे समय में वन ही भूमि का क्षरण रोकते हैं। वृक्ष अपनी जडों से भूमि को बांधे रहते हैं। उसे कटने नहीं देते। पर्वतों पर वृक्ष न रहें तो उनकी हरियाली और सुंदरता समाप्त हो जाती है।

भारतवर्ष में वृक्षों की पूजा तथा वन संरक्षण का महत्व अनादिकाल से रहा है। इसका एक उदाहरण विदुर और धृतराष्ट्र का संवाद है।

महात्मा विदुर कहते हैं -

न स्याद् वनमृते व्याघ्रान् व्याघ्रा न स्युऋतु वनम्।

वनं हि रक्षते व्याघ्रौव्र्याघ्रान रक्षति काननम्॥

महाभारत के इस श्लोक से वनों के संरक्षण की परंपरा की प्राचीनता का ज्ञान होता है।

प्राचीनकाल में वनसंरक्षण के कार्य को धर्म से जोड दिया गया था और वन संरक्षण की जवाबदेही पूरे गांव अथवा शहर की होती थी। आज भी हम देखते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय देवता को वृक्षों के नीचे स्थापित किया जाता है। उस देवता के साथ उस बड, पीपल, नीम, आंवला, शमी आदि वृक्षों की भी पूजा और रक्षा होती है।

पिछले कुछ दशकों से बढती हुई आबादी के कारण वनक्षेत्र में भारी कमी आई है। यह आर्थिक विकास के लिए भले जरूरी हो, लेकिन इसके नुकसान बहुत अधिक हैं। अनादि काल से वनों में और उनके आसपास रहने वाले लोग वनोपज पर आश्रित रहते थे, परंतु जंगल कटने के कारण आज ये लोग भागकर शहरों की तरफ आने लगे हैं। वनवासियों के अलावा वन्य जीव भी वनक्षेत्र की कमी के कारण आए दिन भाग कर शहरों में पहुंच जा रहे हैं। इससे शहरी जनजीवन के लिए भी कई तरह के खतरे पैदा हो रहे हैं।

वन मानव विकास के आधार हैं। वन ही पर्यावरण में संतुलन बनाकर पृथ्वी को बचाए हुए हैं। वनों की कटाई ने वातावरण को इतना प्रदूषित कर दिया है कि जीवन मुश्किल होता जा रहा है। पूरा विश्व आज गंभीर समस्या का सामना कर रहा है। ग्लोबल वॉर्मिग बडी चुनौती बन चुकी है। विश्व भर में बढता तापमान मौसम में परिवर्तन ला रहा है। यह समुद्र का जलस्तर बढाएगा तथा मौसम पर आधारित बदलावों की तीव्रता और आवृत्ति भी बढेगी। ग्लोबल वॉर्मिग के कारण कई प्राकृतिक आपदाओं की आशंका होगी। जिससे अनावृष्टि, अतिवृष्टि, अकाल, लू तथा गर्म हवाओं का प्रकोप बढेगा।

इसलिए हमारे ऋषि-मुनियों तथा आधुनिक वैज्ञानिकों ने पेड-पौधों के संरक्षण तथा संवर्धन पर विशेष बल दिया है। यही वह उपाय है जिससे हमारा पर्यावरण संतुलित रहे और हमें प्रकृति का कोपभाजन भी न बनना पडे। प्रकृति के साथ छेडछाड का परिणाम तो भयानक होगा ही, पेड-पौधे संरक्षित रहेंगे तो हमारे औषधीय पौधे और वृक्ष भी विद्यमान रहेंगे। इसीलिए कुछ विशेष पेड-पौधों को धर्म से जोड कर उन्हें संरक्षित किया गया है। इनका मूलभूत मंतव्य केवल कर्मकांड का निर्वाह नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रत्येक तत्व के महत्व और समाज के लिए उसकी उपयोगिता को समझते हुए उसके प्रति संवेदनशीलता व्यवहार करना है। आध्यात्मिकता का वास्तविक अर्थ भी प्रकृति मात्र के प्रति संवेदनशील होने में ही निहित है।

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(Hindi news from Dainik Jagran, sakhimiscellaneous Desk)

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